जेएनयू में 'आदिवासी साहित्य' का लोकार्पण

जेएनयू में आदिवासी दर्शन और समकालीन आदिवासी लेखन की त्रैमासिक पत्रिका 'आदिवासी साहित्‍य' का महाराष्‍ट्र से आए मशहूर साहित्‍यकार वाहरू सोनवणे, रांची से आई झारखंडी भाषा साहित्‍य संस्‍कृति अखड़ा की महासचिव वंदना टेटे, आदिवासी मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्‍लैडसन डुंगडुंग, स्‍कूल ऑफ लैंग्‍वेज की डीन प्रो. वैश्‍ना नारंग, भारतीय भाषा केन्‍द्र के अध्‍यक्ष प्रो. अनवर आलम और आदिवासी कार्यकर्ता अभय खाखा द्वारा लोकार्पण किया गया. इस अवसर पर पत्रिका के संपादक गंगा सहाय मीणा ने पत्रिका की पृष्‍ठभूमि बताते हुए कहा कि इन दिनों हिंदी अकादमिक जगत में आदिवासी साहित्‍य को लेकर काफी भ्रम की स्थिति है और दूर-दूराज में बड़ी संख्‍या में सक्रिय आदिवासी रचनाकारों की आवाज दिल्‍ली तक नहीं पहुंच पा रही, इसी को तोड़ने के लिए आदिवासी दर्शन को आधार बनाकर हमने राष्‍ट्रीय स्‍तर की यह पत्रिका शुरू की है. मीणा ने आगे कहा कि आदिवासी साहित्‍य की परंपरा को तीन हिस्‍सों में बांटा जा सकता है- मौखिक पुरखा परंपरा, आदिवासी भाषाओं में हो रहा आदिवासी लेखन और हिंदी तथा अन्‍य भारतीय भाषाओं हो रहा समकालीन आदिवासी लेखन. इस पूरी पंरपरा को सामने लाकर ही आदिवासी साहित्‍य की मुकम्‍मल तस्‍वीर बन सकती है.

इस अवसर पर वरिष्‍ठ आदिवासी साहित्‍यकार वाहरू सोनवणे ने कहा कि हम साहित्‍य के उन सारे मानकों को खारिज करते हैं जो दूसरों ने हमारे ऊपर थोपे हैं. बाहरी समाज की सोच व्‍यक्तिवादी है, इसे आप आजादी की लड़ाई के नारों में भी देख सकते हैं जैसे- 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्‍हें आजादी दूंगा' या 'स्‍वराज मेरा जन्‍मसिद्ध अधिकार है'. जो मुक्तिकामी साहित्‍य को खारिज करते हैं वे वर्चस्‍ववादी हैं. जो व्‍यवस्‍था मानव-मानव में भेद करती है, हमें उस पर सवाल उठाना चाहिए.
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